Saturday, September 3, 2011

अचेत

गिरा करता है शोर क्षिपणी सा
आज भी इन कानो के पर्दों पर |
 होता है प्रहार आज भी
तन्हा, पृथक  से इस दिल पर | 
    हैं सोने को बेचैन ये आँखें
    पर जैसे चुरा ली गयी हो नींद |
    उठ नही पा रहे हैं ये पग
    सारी दुनिया है जिन कदमों पर |
भूल गया है मकसद अपना
पर दुनिया से अन्जान नही
है अचेत सा, अनभिज्ञ सा
पर खोया आत्मसम्मान नही |
   राह कठिन है, किंतु हठ कर
   तू आगाज़ से अंजाम तक चल |
   मंजिल तो मिलेगी ही कभी ना कभी
   बस मंजिल की पहचान तू  कर |

-- सिद्धार्थ 

2 comments:

अचेत कुमार said...

idea chura liya :@
bahut hi badiya kavita hai...
par pehle ke do paragraphs mein even pankityan thodi khichhi lag rahi hai.. :S

Sidharth said...

haan yaar.. just a noobie i m.. kahan se laaun ideas.. :P